हक और बातिल की सख्त पहचान है जंग-ए-कर्बला
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मोहम्मद सुलेमान /राकेश कुमार सिंह
गोंडा ( युगनव टाइम्स लाइव ) जंग-ए-कर्बला में हजरत इमाम-ए-हुसैन और उनके जानिसार 72 साथियों की शहादत के गम में मनाए जाने वाला मुहर्रम को लेकर इमामबाड़ों में ताजिया रखने के लिए शिया समुदाय के साथ ही अन्य समुदाय के लोगों द्वारा तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। शिक्षा समुदाय मजलिसों और मातम के लिए फर्श-ए-अजा को सजाने में जुटे हैं।
मुहर्रम क्या है,क्यों मनाया जाता है
इंसानियत और मानवता को बचाने के लिए नबी-ए-करीम के नवासे हजरत इमाम-ए-हुसैन ने अपने कुनबे के लोगों और जांनिसार 72 साथियों की कुर्बानी कर्बला के मैदान में दी थी। तब से इस्लाम अनुयायियों के लिए मुहर्रम की अहमियत सबसे अलग है।
हजरत इमाम-ए-हुसैन का काफिला 61 हिजरी (680 ई०) कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में पहुंचा। इस काफिले के हर शख्स को पता था कि इस रेगिस्तान में भी उन्हें चैन (सुकून) नहीं मिलने वाला और आने वाले दिनों में उन्हें और अधिक परेशानियों बरदाश्त करना होगा। बावजूद इसके सबके इरादे मजबूत थे। अमन और इंसानियत के ‘मसीहा’ का यह काफिला जिस वक्त धीरे-धीरे कर्बला की ओर कूच कर रहा था, रास्ते में पड़ने वाले हर शहर और कूचे में जुल्म और प्यार के फर्क को दुनिया को बताते चल रहा था।
यजीद बेहद क्रूर और जालिम बादशाह था
उस दौर में यजीद एक जालिम हुक्मराह था। वह बजाहिर मुसलमान लेकिन हकीकत में इस्लामी पसंदी का तालीमात का मुखालिफ था। वह अपने जुल्म और ज्यादती के बदौलत शाम(सीरिया) का हाकिम बन बैठा था। वह इमाम-ए-हुसैन को अपना दुश्मन समझता था और इस्लाम को अपनी हुकूमत के लिए सबसे बड़ा खतरा समझ रहा था।
किरदार-ए-वफा थे हुसैन
हजरत इमाम-ए-हुसैन अपने इल्म, एखलाक और किरदार की वजह से अपने वालिद हजरत मौला अली और नाना नबी-ए-करीम की तरह मकबूल थे। इस बीच यजीद की साजिशें बढ़ीं जिसमें इमाम-ए-हुसैन का मदीने में रहना दुश्वार हो गया। आपने समझ लिया कि यदि मदीने में रहा तो यहां मजहब के नाम पर खुरेंजें होगी। इसलिए उन्होंने मदीना छोड़ने का फैसला किया। इमाम से लोगों के प्यार की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वो इस्लाम के आखिरी पैगम्बर के नवासे थे और मिटती हुई इंसानियत को बचाने के लिए जुल्म के खिलाफ निकले थे।
मुहर्रम का चांद देखते ही कलेजा थर्रा जाता है
आज भी मुहर्रम के चांद पर नजर पड़ते ही इंसानियत का कलेजा कांप उठता है। इसकी वजह यह है कि इस चांद की दस तारीख को पैगम्बर-ए-इस्लाम की इकलौती बेटी हजरत-ए- वीबी फात्मा के आंखों के तारे इमाम-ए-हुसैन को दहशतगर्दों ने बेरहमी के साथ तीन दिन के भूखे-प्यासे को कर्बला की तपती हुई रेगिस्तान में शहीद कर दिया था। दहशतगर्दों ने इमाम को यह सोंचकर शहीद किया था कि इंसानियत को दुनिया से मिटा दूंगा, लेकिन वह भूल गया कि वह जिसका खून बहा रहे हैं वह नवासे रसूल का हैं। जो इस अजम के साथ घर से बाहर आया है, वह हक और बातिल के फर्क को दुनिया से मिटा देंगें।
हुसैन ने जब छोड़ा मदीना
इमाम-ए-हुसैन ने अपने नाना का रौजा मां की कब्र भाई हजरत-ए-हसन की कब्र का आखिरी बार जियारत कर मदीना छोड़ दिया था। इमाम मदीने से चले तो पूरा खानदान आपके साथ था, सिर्फ एक बीमार बेटी हजरत-ए- जैनब-ए-सुगरा को नबी-ए-करीम की जौजा हजरत-ए-उम्मे सलमा के पास छोड़ दिया था। 28 रज्जब को मदीने से रवाना हुआ यह काफिला रास्ते की मुसीबतें बर्दाश्त करता हुआ कर्बला पहुंचा। रवायतों में है कि एक जगह पह़ुचकर इमाम के घोड़े ने कदम आगे नहीं बढ़ाया यहां तक कि इमाम ने सात घोड़े बदले लेकिन सभी घोड़ो ने एक भी कदम आगे नही बढ़ाया। तो इमाम ने अपने भाई हजरत-ए-अब्बास से कहा कि यहां कयाम (ठहरा) किया जाये और खेमे लगवा दिए जाएं। फिर मकामी लोगों व इस जमीन के मालिकों को बुलाकर 60 हजार दीनार में यह जमीन खरीदी और इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि इस जगह को हम लोग आबाद करेंगे और आज से यह मुकाम कर्बला के नाम से मशहूर होगा।
