गोंडा: माह-ए-रमजान, जानिए इनके क्या हैं मायने …हाफिज मोहम्मद रईस
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रमजान के महीने में मस्जिदों में पढ़ा जाता है तरावीह व कुरान शरीफ की की जाती है तिलावत
मोहम्मद सुलेमान/ सलाहुद्दीन
गोंडा ( युगनव टाइम्स लाइव ) रमजान के महीने को अल्लाह की रहमत का महीना कहा जाता है. इस पूरे माह में अल्लाह की इबादत की जाती है और एक माह के रोजे रखे जाते हैं. रमजान करीब 30 दिनों के होते हैं, इन्हें तीन अशरों में बांटा गया है.
रमजान मुबारक
इन दिनों रमजान का पाक महीना चल रहा है. ये महीना हर मुसलमान के लिए बेहद खास माना गया है. रमजान के दौरान 29 या 30 दिनों के रोजे रखे जाते हैं. इन तीस दिनों को तीन भागों में बांटा गया है, जिसे अशरा कहा जाता है. इस तरह रमजान का महीना तीन अशरों में बंटा हुआ है. हर अशरे का अलग महत्व है. अशरा अरबी का शब्द है, जिसका मतलब 10 होता है. इस तरह रमजान के महीने के 30 दिनों को 10-10 दिनों में बांटा गया है. जिन्हें पहला अशरा, दूसरा अशरा और तीसरा अशरा कहा जाता है. शुरुआती 10 दिन पहला अशरा कहलाते हैं, 11वें दिन से 20वें दिन तक दूसरा अशरा और 21वें दिन से 29वें या 30वें दिन तक तीसरा अशरा होता है. यहां जानिए रमजान के तीन अशरों का महत्व.
पहला अशरा
रमजान महीने के पहले दिनों को रहमन के दिन कहा जाता है. कहा जाता है कि इन 10 दिनों में मुसलमान जितने नेक काम करता है, जरूरतमंदों की मदद करता है, उन्हें दान देता है, लोगों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है, अपने उन बाशिंदों पर अल्लाह अपनी रहमत बरसाते हैं.
दूसरा अशरा
दूसरे अशरे को मगफिरत यानी माफी का अशरा कहा जाता है. ये अशरा 11वें रोजे से 20वें रोजे तक चलता है. माना जाता है कि इसमें अल्लाह की इबादत करके अगर मुस्लिम सच्चे मन से अपने गुनाहों की माफी मांगे, तो अल्लाह उसके गुनाहों को माफ कर देते हैं. इस दौरान ऐसा कोई काम भूलकर भी नहीं करना चाहिए जो अल्लाह को नाराज करे.
तीसरा अशरा
तीसरे अशरे को बेहद खास माना गया है. ये जहन्नम यानी नर्क की आग से खुद को बचाने के लिए है. तीसरा अशरा 21वें दिन से 29वें या 30वें दिन तक चलता है. रमजान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम मर्द और औरतें एतकाफ में बैठते हैं. माना जाता है कि एतकाफ में बैठने वाले लोगों पर अल्लाह की विशेष रहमत होती है. एतकाफ के दौरान 10 दिनों तक एक ही स्थान पर बैठते हैं, वहीं सोते हैं, खाते हैं और नमाज करते हैं. मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं, जबकि महिलाएं घर के किसी कमरे में पर्दा लगाकर एतकाफ में बैठती हैं. इस दौरान वे जहन्नम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करती है।
