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पसका मेले में लाखों श्रद्धालुओं ने संगम में लगाई डुबकी

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परसपुर (गोण्डा )युगनव टाइम्स लाइव / पौराणिक मान्यताओं को सहेजे भगवान वाराह की अवतार स्थली पसका सूकरखेत में आदिकाल से पौष पूर्णिमा में लगने वाले मेले और मुख्य स्नान का तीन दिवसीय पसका पर्व का समापन शुक्रवार को हो गया। इस मौके पर सैकड़ों नागा,साधु-संतों व करीब पांच लाख श्रद्धालुओं ने सरयू नदी में आस्था की डुबकी लगाई।

मालूम हो कि परसपुर के पसका सूकरखेत

में लगने वाला यह ऐतिहासिक मेला तमाम पौराणिक मान्यताओं को समेटे हुए हैं। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने पृथ्वी को मुक्त कराने के लिये भगवान वाराह का रूप धारण किया था। इसलिए इस तपोस्थली

को सूकरखेत या वाराह क्षेत्र भी कहा जाता है। इस धार्मिक स्थली को लोग स्वर्ग की भी संज्ञा

देते हैं। पवित्र सरयू नदी के तट पर बड़ी संख्या में नागा,साधु-सन्यासी तथा गृहस्थों ने सांसारिक

सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर फूस की कुटिया डाल कर कल्पवास,तपस्या में लीन रहते हैं। पसका सूकरखेत में सरयू व घाघरा दोनों नदियां मिलती हैं। इसलिए इस स्थली को संगम कहते हैं। इस का महात्म्य स्कन्द पुराण में भी इस तरह मिलता है। ‘दशकोटि सहस्त्राणि, दस कोटि शतानि च। तीर्थानि सरयू नद्या घर्घरोदक संगमें’ अर्थात सरयू व घाघरा तट पर हजारों तीर्थ विद्यमान हैं। रामचरित मानस के बालकांड में भी इस पुण्य क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। मानस में कहा गया है कि ‘त्रिविधि ताप नाशक त्रिमुहानी’। ऐसी मान्यता है कि संगम के त्रिमुहानी में स्नान करने से लोगों को तीनों तापों से मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिए पसका संगम को लघु प्रयाग भी कहा गया है। पौष पूर्णिमा पर लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले में शुक्रवार को लाखों श्रद्धालुओं ने स्नान, दान कर भागवत भजन किया। वहीं सनातन धर्म परिषद एवं सूकरखेत विकास समिति के संयुक्त तत्वाधान में पसका में 41वां राष्ट्रीय रामायण मेला एवं सूकरखेत महोत्सव का भी आयोजन हुआ। समिति के अध्यक्ष डॉ० स्वामी भगवदाचार्य ने बताया कि सूकरखेत संगम स्नान पर्व पर भारी संख्या में साधु संत संन्यासी व गृहस्थ जन सीताराम नाम जप,भजन करके सत्संग व भंडारा में शामिल हुए। यह भी मान्यता है कि पसका सूकरखेत राजापुर में रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म हुआ था। यहां तुलसीदास जी के गुरु नरहरिदास जी का आश्रम भी है। रामचरित मानस के बालकांड में इस स्थान का उल्लेख तुलसीदास जी ने किया है। कहते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस पुण्य भूमि पर अपने गुरु से दीक्षा ली थी। उनके गुरु के आश्रम में आज भी हस्तलिखित रामायण के पन्ने इस स्थली के ऐतिहासिकता की गवाही दे रहे हैं।

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