प्रधान पति पर लगाया दलित उत्पीड़न का आरोप पीड़िता ने आईजी से की शिकायत
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नवाबगंज रिपोर्टर आशीष तिवारी
नंदिनी नगर (नवाबगंज गोंडा) थाना क्षेत्र लौव्वावीरपुर गाँव में बीते रविवार को गाँव के प्रधान के पति
,और उनके गुर्गों द्वारा दलित महिला से छेड़खानी की गई थी और विरोध करने पर महिला उसकी जेठानी सहित अन्य परिजनों को असलहे के बल पर घर में घुसकर मारा-पीटा और तोड़-फोड़ की थी। इस मामले में पुलिस द्वारा प्रधान पति के रसूख के प्रभाव में आकर पुलिस द्वारा एकपक्षीय कार्यवाही करते हुए 02 दलित महिलाओं सहित कुल 08 दलितों पर बलवा सहित अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कर लिया था लेकिन पीड़ित परिवार की तहरीर लेने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की। जिससे हताश होकर पीड़ित दलित परिवार एक हफ्ते से जिले के आला पुलिस अधिकारियों के दरबार में चक्कर लगा रहा है लेकिन स्थानीय पुलिस पीड़ित दलित परिवार का मुकदमा पंजीकृत करने में हिचकिचा रही है। एक तरफ स्थानीय पुलिस दलितों को अपराधी मानते हुए उन पर गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कर चुकी है वहीं दूसरी तरफ पीड़िता कि सुरक्षा में भी लगी हुई है। अब सवाल यह है कि जब पुलिस पीडित दलित महिला अपराधी मानते हुए उस पर मुकदमा दर्ज कर चुकी है तो अपराधी को सुरक्षा क्यों दे रही है?
जिन 08 दलितों पर पुलिस ने बलवा सहित अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया है उन सभी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। जबकि पुलिस की पैनी निगाह में निर्दोष और पीड़ित प्रधान पति जितेंद्र तिवारी के विरुद्ध 2017 में हरिजन एक्ट और 323,427,452,504,506 जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत है और वह हाईकोर्ट के अरेस्ट स्टे के बल पर बाहर घूम रहे हैं। उस समय जितेन्द्र तिवारी खुद ग्राम प्रधान थे और उस समय भी उनके रसूख के आगे घुटने टेक चुकी पुलिस द्वारा पीड़ित को लगभग 06 दिनों तक डाक्टरी का झांसा देकर उलझाए रखा गया था। उस मामले पीड़ित का मुकदमा न्यायालय की शरण में जाने के बाद ही दर्ज हुआ था। जितेंद्र तिवारी द्वारा एक बार फिर हरिजन उत्पीड़न की घटना की पुनरावृत्ति की गई है और इस मामले में पुलिस एवं जिले में बैठे आला हुक्मरानों की प्रतिक्रिया कमोबेश वैसी ही है। क्या एक बार फिर पीड़ित दलित परिवार को न्यायालय की ही शरण लेनी पड़ेगी यदि इसका जवाब हां हुआ तो यह पुलिस और जिले में बैठे पुलिस अधिकारियों की साख पर बट्टा लगना ही होगा। पहले ही चल रहे दलित उत्पीड़न के मुकदमे के सामने आने से यह तो सिद्ध ही हो रहा है कि गरीब और कमजोर दलितों का उत्पीड़न करना प्रधान पति का शौक है और पुलिस भी उसमें सहयोग कर रही है। जिससे पीड़ित को न्याय मिलने की संभावना ना के बराबर रह गई है।
